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Thursday, 25 May 2023

खौफनाक भविष्य और बच्चों में घटती सहनशीलता

- छह गुना बढ़ गए पर्यावरणीय खतरे

प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप दिनोंदिन भयावह होता ही जा रहा है, पर्यावरण पर समग्र वैश्विक चिंतन चल रहा है लेकिन हालातों में फिर भी सुधार नहीं आ रहा है। वैश्विक विषयां पर सुधार को लेकर समस्त विश्व को एकाग्र होकर और समग्र होकर कार्य करना होगा। पर्यावरण के संकट से न केवल प्रकृति पर संकट गहरा रहे हैं वरन मानव जाति के लिए भी भविष्य दुष्कर और दर्दनाक होने की ओर अग्रसर हो रहा है। मौजूदा हालात में बात करें तो संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने 24 मई 2023 को जारी एक रिपोर्ट में गहरी चिंता जताई है कि पूर्वी एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के बच्चे, अपने दादा-दादी की तुलना में, छह गुना अधिक जलवायु सम्बन्धित खतरों का सामना कर रहे हैं जिससे उनकी सहनशीलता कम होती जा रही है और असमानताएँ बढ़ रही हैं। सोचिएगा कितनी महत्वपूर्ण और गहन बात है कि दादा-दादी से पोते-पोतियों तक आते आते हालात इतने अधिक खराब हो गए हैं कि छह गुना अधिक खतरे बढ़ गए हैं इसमें जो सबसे चिंतन की बात है वह यह कि सहनशीलता कम हो रही है और असमानाएं बढ़ रही हैं...। इस दौर में जबकि सबसे अधिक गहन और मंथन की आवश्यकता है, इस दौर में जबकि सबसे अधिक उस पीढी को जागरुक होने और कार्य करने को तैयार की आवश्यकता है उस दौर में उस पीढ़ी की सहनशीलता घटना चिंता का विषय है। ऐसे में उस को कैसे सुधारा जाएगा जिससे हमें सभी भयभीत भी हैं और अंदर से बेहद खामोश भी। आखिर कौन सी सुबह और कौन सा परिवर्तन आएगा और कब...। आखिरकार हालात बदलने की ओर कार्य करने में जुटे वैश्विक संगठनों के सामने यह रिपोर्ट गहरी चिंता खडी करती है। पूर्वी एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में यह हालात हैं।

यहां हम यदि आंकड़ों की बात करें तो यूनीसेफ़ की नवीनतम क्षेत्रीय रिपोर्ट ’ओवर द टिपिंग प्वाइंट’ के अनुसार पिछले 50 वर्षों में, पूर्वी एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में बाढ़ में 11 गुना वृद्धि देखी गई है, तूफ़ान 4 गुना बढ़े हैं, सूखे में 2.4 गुना की वृद्धि और भूस्खलन में 5 गुना बढ़ोत्तरी देखी गई है। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि बाढ़, तूफान, सूखा और भूस्खलन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं इनसे होने वाले नुकसान और इनकी पुनरावृत्ति ने कहीं न कहीं उस आने वाली पीढ़ी उन बच्चों में सहनशीलता को तोड़ा है, कमजोर किया है। यदि इनके कारणों पर बात करें तो वह बहुत हैं लेकिन यहां हम इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट के मूल को लेकर चिंतित हैं और सवाल उठते हैं कि क्या हालात सुधरेंगे, कब तक सुधरेंगे और हालातों के सुधरने की गति क्या होगी ? साथ ही चिंतन के बीच एक भय यह भी सुनाई पड़ता है कि यदि हालात नहीं सुधरे और यह और अधिक खराब हो गए तब क्या होगा, क्या उन बच्चों का रुख, व्यवहार, बर्ताव, विचार एक स्याह भविष्य की ओर अग्रसर होते नजर आएंगे ? बहरहाल यह गहरी चिंता को जन्म तो देता है क्योंकि सुधार की शुरुआत तभी हो सकती है जब आपका मन प्रबल हो, आप संकट को समझने और पढ़ने की ताकत अपने भीतर रखते हों लेकिन यदि आप आत्म नियंत्रण खोने की ओर अग्रसर हो रहे हैं तब सुधार की गति और लक्ष्य कैसे तय होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा है। 

यहां इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तापमान और समुद्री स्तर में वृद्धि और चरम मौसम की तूफ़ान, भयंकर बाढ़, भूस्खलन और सूखे जैसी घटनाओं के कारण, लाखों बच्चे जोखिम में हैं, बहुत से बच्चे व उनके परिवार विस्थापित हो गए हैं और स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पानी एवं साफ़-सफ़ाई से दूर वो जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सोचिएगा तो रुह कांप जाएगी कि यह हालात हमारे सामने इसी दौर में सामने हैं और सुधार की गति और नीतियों पर गंभीर चिंतन आवश्यक है क्योंकि संकट पर यदि समग्र नहीं हुए तो वह पूरे विश्व को अपनी गिरफ्त में ले लेगा।

यहां पर यह उल्लेखित किया गया है इसे भी हमें पढना, समझना और मनन करना चाहिए ताकि हमें संकट और भविष्य की मौजूदा दिशा का अंदाजा हो सके। यूएन समाचार में प्रकाशित इस खबर में पूर्वी एशिया और प्रशान्त स्थित यूनीसेफ़ कार्यालय की क्षेत्रीय निदेशक डेबोरा कॉमिनी ने बताया कि “पूर्वी एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में बच्चों के लिए स्थिति बेहद ख़तरनाक है। जलवायु संकट से उनके जीवन को जोखिम है, और वे अपने बचपन और जीवित रहने व ख़ुशहाल जीवन जीने के अधिकार से वंचित हो गए हैं। यह चिंता की समय है और चिंता वैश्विक है इसलिए हमें भी उसे समझना, सीखना और मनन करना चाहिए क्योंकि पर्यावरण का संकट तत्काल सुधार की एक ठोस और सुव्यवस्थित ईमानदार प्लानिंग चाहता है जिसके अमल में केवल सरकारों का नहीं बल्कि आम नागरिकों की भी सहभागिता अनिवार्य है। आखिर में यह भी देख लें कि हालात कैसे हैं और कितने खौफनाक हैं...शायद हम समझ सकें और गहन होकर एक लक्ष्य की ओर समग्र अग्रसर हो सकें। बच्चों के जलवायु जोखिम सूचकांक (ब्त्प्) पर आधारित इस नवीनतम विश्लेषण के अनुसार, पूर्वी एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में, 21 करोड़ से अधिक बच्चे, चक्रवातों के अत्यधिक जोखिम में हैं। 14 करोड़ बच्चे पानी की अत्यधिक कमी से पीड़ित हैं। 12 करोड़ बच्चे, तटीय बाढ़ के अत्यधिक ख़तरे में रहते हैं और 46 करोड़ बच्चे प्रदूषित वायु में जीने को मजबूर हैं। 

सोचिए कि कल कैसा होगा, होगा या नहीं होगा...? हमें बेहतर की ओर अग्रसर होने के लिए अपडेट रहना होगा और सुधार के लिए बिना शर्त कार्य में जुटना होगा...तभी यह हालात बदले जा सकेंगे। बात का मूल यदि समझा जाए तो जब मूलभूत सुविधाओं में गहरी कमी आ रही है, सामान्य जीवन भी चुनौती है, प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है ऐसे में किस तरह उन बच्चों के सहनशील बने रहने की उम्मीद की जा सकती है, हालांकि सुधार पर कार्य पहला फोकस होना चाहिए लेकिन हालात सुधारने के लिए मन को प्रबल और और शरीर को सशक्त होना जरुरी है लेकिन विश्व को मानवीय होकर सुधार के कठोर मानदंड बनाने होंगे। 


संदीप कुमार शर्मा, 

ब्लॉगर

 

Wednesday, 24 May 2023

किसी को गर्मी, किसी को बादल, कहीं जलप्रलय


हे ईश्वर ये कैसा दौर है, कहीं कोई भीषण गर्मी से तप रहा है, उम्मीदें पसीने के साथ रोज नमकीन होकर जमीन पर गिर रही हैं, कहीं बारिश का इंतज़ार है तो कहीं बारिश प्रलय कही जा रही है। यह कैसा दौर है जो हिस्से सूखे रह जाया करते थे आज बाढ़ की चपेट में हैं और जहां प्रचुर बारिश थी वहां औसत बारिश भी नहीं हुई...। यकीन मानिए कुछ तो बदला है हमने और हमारी सनक ने...। प्रकृति का अपना नजरिया है और वह सालों से जांचा परखा है...। हमने नदियों को रास्ता नहीं दिया उनके रास्ते में आ गए, हमने नदियां खत्म कीं, जंगल उजाड़े, प्रकृति को ताकत देने वाले पौधे हमने नकार दिए, हमें स्वाभाविक प्रकृति पसंद नहीं है, हमें प्रचंड गर्मी में अथाह ठंडक चाहिए, हमें ठंड में कृत्रिम गर्मी चाहिए...। हमें बारिश केवल बाढ़ की तरह ही आफत लगती है, हमें बच्चों से प्रकृति पर बात करना पसंद नहीं है, हम पक्के घर, शहर और सीमेंट जैसी मानसिकता को अपना चुके हैं...। दोष किसी को मत दीजिए सालों प्रकृति ने संतुलित बंटवारा किया, अब जो हो रहा है वह हमारी जिद है, हमारी सनक है...। एक खूबसूरत दुनिया हमने ऐसी बना दी है... सोचिएगा... अभी बहुत है जिसे समझना होगा...। पहले कच्चे घर और दालान होते थे, रौशनदान होते थे, गांव में लगभग हर घर एक वृक्ष होता था, हरेक के पास समय होता था, मौसम पर बात होती थी। तब एक सप्ताह की झड़ी होती थी लेकिन आपदा नहीं होती थी, सुव्यवस्थित नगर संयोजन था, बारिश के पहले नालियां और नाले साफ होते थे, नदियां स्वतंत्र अपनी राह बहती थीं, हम खुश रहते थे, दूसरों के साथ मिलकर चलते थे, बारिश की मनुहार में गीत गाए जाते थे... अब सबकुछ बदल गया है...। क्या करें ...बस चिंतन कीजिए...। समझना जरुरी है कि हमने अपनी इस खूबसूरत धरती को संकटों का अजीबोगरीब केंद्र बना दिया है जहां पहले सबकुछ स्वतः ही संचालित होता था वहां अब जैसे सबकुछ बारी बारी थमता जा रहा है, उलझता जा रहा है...सोचिएगा दोस्तों ऐसे में जिंदगी कैसे और कब तक सुरक्षित रह पाएगी। 

संदीप कुमार शर्मा, संपादक, प्रकृति दर्शन, पत्रिका 

Monday, 22 May 2023

जंगल कटने की भरपाई क्या संभव है ?


जब घर टूटता है, तब टूटता है आदमी

जब वृक्ष कटता है, गर्त होती हैं पीढ़ियां।

एक वृक्ष का हिसाब पूछिये तो भला कि जब बीज से वृक्ष बनता है तब क्या-क्या सहता है और क्या भोगता है ? कितनी गर्मियां, कितनी सर्दी, कितने तूफान सहकर कोई पौधा वृक्ष बनता है और सोचिए कि जब उसे उखाड़ दिया जाता है तब हम कितना कुछ उजाड़ देते हैं...? यहां तो बात केवल एक वृक्ष की नहीं बल्कि पूरे के पूरे गहरे और गहन जंगल को काट देने की हो रही है और सोचिएगा तब हम कितना खोएंगे...उसका हिसाब शायद गणितीय तौर पर हम ना निकाल पाएं...? लेकिन व्यवहारिक तौर पर समझ सकते हैं कि एक पूरे जंगल के कटने का आशय केवल प्रकृति की बर्बादी नहीं है बल्कि वह हमारे पूरे जीवन और भविष्य को बुरी तरह तहस-नहस कर जाएगा। मेरा एक ही सवाल है कि एक वृक्ष के उगने से लेकर उसके फायदों का गणितीय हिसाब लगाकर देखियेगा और तब बताईयेगा कि क्या जंगल कटने के नुकसान की भरपाई संभव है ?

सरकारी योजनाओं के पीछे के तर्क बहुत खूबसूरत और लुभावने होते हैं कि हमें- 

सुविधाएं होंगी।

हमें विकास मिलेगा। 

हमें रोजगार मिलेगा। 

हम आर्थिक तौर पर संपन्न होंगे। 

क्या कोई बताएगा कि 

क्या हमें ऑक्सीजन मिलेगी ?

क्या हमें समय पर और प्रचुर बारिश मिलेगी ?

क्या हमें इस झुलसन से राहत मिलेगी ?

क्या हमें बेहतर भविष्य की उम्मीद की छांह मिलेगी ?

क्या हमें सुरक्षित भविष्य की गारंटी मिलेगी?

क्या जमीन प्यासी नहीं होगी?

क्या काटे गए वृक्षों के नुकसान का बारीकी आकलन किया गया है?


गहरा सन्नाटा है इन सवालों पर क्योंकि योजनाओं का निर्धारण हमेशा अर्थ की पीठ पर किया जाता है, मानवीयता और सामाजिक पहलुओं को योजनाओं में कितनी जगह मिलती है, यह सभी जानते हैं। कोरोना संक्रमण काल हमें बता गया कि हम अपनी मेडिकल ऑक्सीजन व्यवस्था पर कितने निर्भर रह सकते हैं और हमें प्रकृति को सहेजने की कितनी अधिक आवश्यकता है। बेहतर होगा कि जंगल की बली चढ़ाने से पहले हजार बार सोचा जाए, प्रकृति को नोंचना एक मानवीय अपराध की श्रेणी में ही आना चाहिए। हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं, प्रकृति संरक्षण पर वैचारिक शून्यता भयभीत करने वाली है लेकिन यह चुप्पी निश्चित ही हमारे मूल को बर्बाद कर जाएगी। बात करें मध्यप्रदेश के बक्सवाहा में हीरे खदान की तो यहां केवल प्रकृति ही नहीं बल्कि पुरातन संस्कृति भी दांव लगी। एक ओर जब बक्सवाहा के हरे भरे जंगल को खोदकर हीरे निकालने का निर्णय ले लिया गया, लेकिन ठीक उससे पहले यह भी पता चल गया कि बस्सवाहा में 25 हजार साल पुराने शैल चित्र मिले हैं और विशेषज्ञों द्वारा बताया जा रहा है कि यह रॉक पेटिंग आग की खोज के पहले के हो सकते हैं....। जंगल की परवाह विकास के धुन में जुटे लोगों को तो कतई नहीं है। इस तरह हरे भरे गहरे जंगल के साथ बक्सवाहा में पुरातन संस्कृति भी मौजूद होने की सूचना मिली बहरहाल पर्यावरणविद इसे लेकर सक्रिय हो गए और जंगल बचाने को उठ खड़े हुए लेकिन मूल यह है कि ऐसे हालात बनते ही क्यों हैं, क्यों विकास के लिए एक गहरे जंगल की बली दे देना बेहद आसान लगता है। फिल्हाल हम इतना तय करें कि ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसे निर्णय प्रकृति को गहरे तक आघात दे जाते हैं। बात करें मप्र के खंडवा जिले में बीते कुछ वर्ष पूर्व बांध के निर्माण के कारण एक नगर हरसूद जो बैकवॉटर में पूरी तरह जलमग्न हो गया, काफी गांव भी डूबे हैं लेकिन हरसूद एक पुरातन नगर था और उसके डूबने का दर्द आज तक वहां के रहवासियों के चेहरों पर देखा जा सकता है, हालांकि उन्हें नए हरसूद छनेरा में बसा दिया गया लेकिन अपनी पुरातन नगरी को वह आज तक नहीं भूले हैं। यहां अधिकांश वे दावे अधूरे ही रह गए जो सरकार द्वारा किए गए थे। हम बात करें कि जंगल जो डूब गया, जीव जो डूब गए, असंख्य जैव विविधता जो डूब गई...उसका कोई हिसाब नहीं है। मैं केवल इतना पूछना चाहता हूं कि क्या विकास के लिए प्रकृति हर बार दम तोड़ती रहेगी ? आखिर हम कैसा विकास चाहते हैं, कैसी सनक है हमारी,कैसी सीमेंट की सडकें, कैसे सीमेंट के नगर चाहते हैं, कैसी और कितनी सुविधाओं का अंबार हमें चाहिए और आखिर इसकी कोई सीमा है या नहीं ? यह गैर जरुरी है क्योंकि यहां सभी तक आकर इसलिए हार जाएंगे क्योंकि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ अपना जीवन जीया है और उन्होंने विकास  के पीछे दौड नहीं लगाई यही वजह थी कि उनकी आयु 100 के आसपास होती थी, लेकिन हम विकास वाले युग में जीने के बाद भी 55 से 60 तक उस औसत आयु को खींच लाए हैं, सोचने को बहुत कुछ है...पहले घर छोटे थे लेकिन हवादार थे, आंगन नीम होता था, बीमारी नहीं होती थी, पैदल चलना पसंद करते थे, दवाईयों को कोई खर्च नहीं था, मैदानी खेल पसंद किए जाते थे....ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो आज देखने को नहीं मिलते...। बहरहाल प्रयास किया है कि यह अंक बक्सवाहा और हरसूद पर केंद्रित कर सकें। हरसूद के दर्द से सीख लें और बक्सवाहा और ऐसे ही और निर्णय लिए जाने के पहले हजार बार सोचना जरुरी होना चाहिए? जंगल काटना, वन्य जीवों को खत्म करना ही यदि विकास की पहली पायदान है तो ऐसी पायदान मानवीय समाज में हमेशा ही नकारी जाती रहेगी। 


संदीप कुमार शर्मा,  प्रधान संपादक, प्रकृति दर्शन, पत्रिका 

तितली से ही सीख लें प्रकृति को देना


‘जैव विविधता’ अमूमन यह शब्द सभी को बेहद आसानी से समझ नहीं आता क्योंकि हममें से प्रकृति से सीधा वास्ता तो सभी का है लेकिन प्रकृति पर गंभीर बहुत थोड़ा सा वर्ग है और उस वर्ग में भी गहन होकर जो मनन करता है, सोचता है, ज्ञान अर्जित करता है वही जैव विविधता का अर्थ समझ सकता है, उसकी उपयोगिता को महसूस कर सकता है, उसके संतुलन की गड़बड़ी पर अंदर तक कंपित हो सकता है। उस परमपिता ने जब प्रकृति को रचा तब इसे बेहद खूबसूरत तरीके से स्वसंचालित होने का एक सिस्टम भी तैयार किया। उसने पौधों को, पक्षियों को, वन्यजीवों को, जलचरों को, हम इंसानों को सभी एक दूसरे में पिरोया है यूं भी कहा जा सकता है कि एक दूसरे की जिम्मेदारी सौंपी, उसके निर्वहन का भी तरीका बनाया और उसी तरीके से इस प्रकृति के स्वसंचालन का सिस्टम तैयार किया। तेजी से बहुत सा ऐसा है जो खत्म हो रहा है, चाहे पौधों की प्रजाति हों या पक्षियों की, कीट पतंगों की प्रजाति हो या वन्य जीवों की जो बेहद चिंता की बात है क्योंकि यह सिस्टम कहीं न कहीं इन्हीं से संचालित होता है। तितलियां के रंग तो हम सभी को आकर्षित करते ही होंगे लेकिन क्या हम जानते हैं कि यह नन्हीं सी तितली हमारे इस सिस्टम को संचालित करने के लिए कितना महत्वपूर्ण योगदान देती है, जैवविविधता में तितली का भी अहम योगदान है...कीटों का भी और पतंगों का भी। हम इंसान केवल इतना सोच लें कि केवल हमीं ने यह मानसिकता बनाई है कि हम प्रकृति से लेंगे लेकिन देंगे कुछ नहीं...हमारे अलावा इस धरा पर, प्रकृति में जीने वाला हरेक जीव इसे लौटाता है, इस सिस्टम को बेहतर संचालित होने में मददगार है, जब एक तितली प्रकृति में अपना योगदान दे सकती है तो हम क्यों नहीं...सोचिएगा क्योंकि जैवविविधता संकट के दौर में है और उसे बेहतर बनाने के लिए हमें भी उसी निष्ठा से कार्य करना होगा, उस माहौल को, उन पक्षियों, कीटों को आश्रय देना होगा जिनका होना हमारे जीवन के लिए अनिवार्य है...। सोचिएगा...यह कैसी विविधता है...हममें और मासूम कीट, पतंगों में...। 


संदीप कुमार शर्मा, 
प्रधान संपादक, प्रकृति दर्शन 


 

Sunday, 21 May 2023

हम विकसित हैं तो नजर क्यों नहीं आते

 


पता नहीं इस पर शर्म आनी चाहिए या गर्व...क्योंकि इतनी खूबसूरत प्रकृति में जब हमें सही तरीके से जीते ही नहीं आया, समझ ही नहीं आया तब हम उसका शोषण करने लगे और उसके आदी हो गए, अपने नगरों और घरों के आसपास हमने कचरों के कुछ ऐसे पहाड़ बना लिए हैं। कैसे समझा सकता हूं कि हमारे ही शहर हैं, हमारे ही घर हैं और उन घरों शहरों के बीच हम भागते रहते हैं और जहां हमें सबसे अधिक सुकून मिलना चाहिए वहां हमें बदबू और बीमारियां मिलती हैं। हम अपने शहरों की बेहतर बसाहट पर कतई गंभीर नहीं है क्योंकि हमारा मन कचरा फैंकते समय एक पल के लिए हमें नहीं धिक्कारता है कि हम आखिर कर क्या रहे हैं....और हम सभी का कचरा जब एकत्र होता जाता है तब वह एक ऐसा खौफनाक चेहरा इख्तियार कर लेता है जिसे देखकर हमें तब भय लगना आरंभ होता है जब उससे बदबू आती है और आसमान पर सितारों की जगह अधिकांश कौवे और चील ही नजर आती हैं। 

कोई नहीं...हम न जागें किसी का कुछ भी नहीं खराब होगा, हमारा स्वास्थ्य, हमारा जीवन, हमारे बच्चों का भविष्य और हमारी उम्र की सांझ ही कालिख भरी होगी। बसाहट जरुरी है, वे पुरातन संस्कृति की बसाहट वाले नगर जो खुदाई के बाद भी सुव्यवस्थित निकले वह हमसे बेहतर थे, हम बेशक विज्ञान के युग का झुनझुना बजाएं लेकिन हकीकत यह है कि हमें अपने नगरों की बसाहट और हमारे जीवन के आसपास के माहौल को बेहतर तरीके से बुनना तक नहीं आया। खैर, समझिये कि एक थैली कचरा हम बेतरतीब तकीके से फैंकना आरंभ करेंगे तो वह कल हमारे लिए ही संकट बनेगा। कचरा चाहिए या जीवन...नगर के मुहाने पर पहले स्वागत द्वार बनाए जाते थे और अब कचरे के पहाड़ स्वतः ही आकार ले लेते हैं....वाकई हम विकसित समय के रहवासी हैं....तभी तो हम इस सुखद धरा और प्रकृति को मटियामेट कर उसे छोड़कर कभी मंगल और कभी चांद पर भागने की प्लानिंग बना रहे हैं। यदि हम वाकई विकसित हो रहे हैं तो हमारे आचार व्यवहार में वह नजर क्यों नहीं आता ?

संदीप कुमार शर्मा, संपादक, प्रकृति दर्शन

राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 

Friday, 19 May 2023

तालाबों को समझिए यह जीवन का आधार हैं

 

 

तालाब धरा पर हमारे पानीदार होने के प्रतिबिंब हैं। देश का अतीत देखा जाए, पढ़ा जाए, समझा जाए तो हम पानीदार थे और पानी की गहरी समझ रखते थे। हमारे अतीत ने हमें पानीदार धरती सौंपी थी लेकिन समय बीतता गया और वैचारिक बदलाव गहराने लगे, हमने कारोबार को तरजीह देना आरंभ कर दिया, अब पानी बिक रहा है, अब नदियों पर कारोबार आकार ले रहे हैं। खैर, हम बात केवल तालाब की कर रहे हैं क्योंकि वे हमारी धरती पर जीवन का आधार हैं, तालाब का आशय केवल हमारे लिए पानी नहीं वरन धरती के सूखे कंठ के लिए भी पानी है। हमें तालाब के ज्ञान और विज्ञान को समझना होगा क्योंकि बिना तालाब हम अपने अच्छे भविष्य का सपना नहीं देख सकते हैं। 
देश के विभिन्न हिस्सों में यदि हम भ्रमण करते हैं तो हमें तालाब अवश्य नजर आते हैं, हमारा प्रकृति के प्रति यदि लगाव है तो हम चिंतित नजर आते हैं और हल्की सी टिप्पणी कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन यदि हम पानी के महत्व को समझते हैं तो हम ठहर जाते हैं और उसे समझने का प्रयास करते हैं, एक बहुत बड़ी आबादी बिना ठहरे ही आगे बढ़ जाती है। हम पाते हैं कि हमारे बीच के तालाब जो कभी हमें पानी और हमारे क्षेत्र की भूजल व्यवस्था को पानीदार रखते थे, अब कूढ़े के ढेर में तब्दील हो चुके हैं या फिर उनका नामोनिशान मिट चुका है। हमारे बीच तालाब अब भी तालाब हैं, हममें उन्हें लेकर जागरुकता की आवश्यकता है, नदियां सिमट रही हैं, सूख रही हैं, बरसाती नालों में तब्दील हो रही हैं ऐसे में तालाब ही हैं जिन्हें हम समझ लेंगे तो कुछ हद तक अपने हिस्सों का पानी बचा सकते हैं, नदियों का सूखना या मिटना सभ्यता के दरकने जैसा ही है लेकिन तालाबों का खत्म होना भविष्य पर प्रश्नचिन्ह है। देश के विभिन्न हिस्सों में तालाब पर कार्य हो रहे हैं, राजस्थान में वृहद स्तर पर कार्य रहा है, जलपुरुष राजेंद्रसिंह जी देश के विभिन्न हिस्सों में जल, नदियों और तालाबों की जागरुकता को लेकर कार्य कर रहे हैं, अनेक संकठन हैं जो जल जागरुकता लाने में जुटे हैं लेकिन हकीकत यह है कि बदलाव तब आएगा जब आम व्यक्ति मरते तालाबों का दर्द महसूस करेगा, उठ खड़ा होगा और उनके कायाकल्प में जुट जाएगा। हम यह पूरा सिस्टम सुधार सकते हैं बस अपने अपने आसपास के तालाबों की जिम्मेदारी हम मोहल्ला या गांव समिति बनाकर उठा लें, उनकी सफाई करें, उन्हें खराब न हो दें, उसका जल दूषित न होने दें...। तालाबों को लेकर समझदारी बढ़ानी होगी वरना न जमीन के भीतर पानी होगा और न ही जमीन के तल पर...। बेपानी सभ्यता होते हम नहीं देखते हैं इसलिए आगे आईये और कार्य में जुट जाईये...। 


संदीप कुमार शर्मा, 
प्रधान संपादक, प्रकृति दर्शन 


खौफनाक भविष्य और बच्चों में घटती सहनशीलता

- छह गुना बढ़ गए पर्यावरणीय खतरे प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप दिनोंदिन भयावह होता ही जा रहा है, पर्यावरण पर समग्र वैश्विक चिंतन चल रहा है लेकिन...