‘जैव विविधता’ अमूमन यह शब्द सभी को बेहद आसानी से समझ नहीं आता क्योंकि हममें से प्रकृति से सीधा वास्ता तो सभी का है लेकिन प्रकृति पर गंभीर बहुत थोड़ा सा वर्ग है और उस वर्ग में भी गहन होकर जो मनन करता है, सोचता है, ज्ञान अर्जित करता है वही जैव विविधता का अर्थ समझ सकता है, उसकी उपयोगिता को महसूस कर सकता है, उसके संतुलन की गड़बड़ी पर अंदर तक कंपित हो सकता है। उस परमपिता ने जब प्रकृति को रचा तब इसे बेहद खूबसूरत तरीके से स्वसंचालित होने का एक सिस्टम भी तैयार किया। उसने पौधों को, पक्षियों को, वन्यजीवों को, जलचरों को, हम इंसानों को सभी एक दूसरे में पिरोया है यूं भी कहा जा सकता है कि एक दूसरे की जिम्मेदारी सौंपी, उसके निर्वहन का भी तरीका बनाया और उसी तरीके से इस प्रकृति के स्वसंचालन का सिस्टम तैयार किया। तेजी से बहुत सा ऐसा है जो खत्म हो रहा है, चाहे पौधों की प्रजाति हों या पक्षियों की, कीट पतंगों की प्रजाति हो या वन्य जीवों की जो बेहद चिंता की बात है क्योंकि यह सिस्टम कहीं न कहीं इन्हीं से संचालित होता है। तितलियां के रंग तो हम सभी को आकर्षित करते ही होंगे लेकिन क्या हम जानते हैं कि यह नन्हीं सी तितली हमारे इस सिस्टम को संचालित करने के लिए कितना महत्वपूर्ण योगदान देती है, जैवविविधता में तितली का भी अहम योगदान है...कीटों का भी और पतंगों का भी। हम इंसान केवल इतना सोच लें कि केवल हमीं ने यह मानसिकता बनाई है कि हम प्रकृति से लेंगे लेकिन देंगे कुछ नहीं...हमारे अलावा इस धरा पर, प्रकृति में जीने वाला हरेक जीव इसे लौटाता है, इस सिस्टम को बेहतर संचालित होने में मददगार है, जब एक तितली प्रकृति में अपना योगदान दे सकती है तो हम क्यों नहीं...सोचिएगा क्योंकि जैवविविधता संकट के दौर में है और उसे बेहतर बनाने के लिए हमें भी उसी निष्ठा से कार्य करना होगा, उस माहौल को, उन पक्षियों, कीटों को आश्रय देना होगा जिनका होना हमारे जीवन के लिए अनिवार्य है...। सोचिएगा...यह कैसी विविधता है...हममें और मासूम कीट, पतंगों में...।
संदीप कुमार शर्मा,
प्रधान संपादक, प्रकृति दर्शन
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