तालाब धरा पर हमारे पानीदार होने के प्रतिबिंब हैं। देश का अतीत देखा जाए, पढ़ा जाए, समझा जाए तो हम पानीदार थे और पानी की गहरी समझ रखते थे। हमारे अतीत ने हमें पानीदार धरती सौंपी थी लेकिन समय बीतता गया और वैचारिक बदलाव गहराने लगे, हमने कारोबार को तरजीह देना आरंभ कर दिया, अब पानी बिक रहा है, अब नदियों पर कारोबार आकार ले रहे हैं। खैर, हम बात केवल तालाब की कर रहे हैं क्योंकि वे हमारी धरती पर जीवन का आधार हैं, तालाब का आशय केवल हमारे लिए पानी नहीं वरन धरती के सूखे कंठ के लिए भी पानी है। हमें तालाब के ज्ञान और विज्ञान को समझना होगा क्योंकि बिना तालाब हम अपने अच्छे भविष्य का सपना नहीं देख सकते हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों में यदि हम भ्रमण करते हैं तो हमें तालाब अवश्य नजर आते हैं, हमारा प्रकृति के प्रति यदि लगाव है तो हम चिंतित नजर आते हैं और हल्की सी टिप्पणी कर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन यदि हम पानी के महत्व को समझते हैं तो हम ठहर जाते हैं और उसे समझने का प्रयास करते हैं, एक बहुत बड़ी आबादी बिना ठहरे ही आगे बढ़ जाती है। हम पाते हैं कि हमारे बीच के तालाब जो कभी हमें पानी और हमारे क्षेत्र की भूजल व्यवस्था को पानीदार रखते थे, अब कूढ़े के ढेर में तब्दील हो चुके हैं या फिर उनका नामोनिशान मिट चुका है। हमारे बीच तालाब अब भी तालाब हैं, हममें उन्हें लेकर जागरुकता की आवश्यकता है, नदियां सिमट रही हैं, सूख रही हैं, बरसाती नालों में तब्दील हो रही हैं ऐसे में तालाब ही हैं जिन्हें हम समझ लेंगे तो कुछ हद तक अपने हिस्सों का पानी बचा सकते हैं, नदियों का सूखना या मिटना सभ्यता के दरकने जैसा ही है लेकिन तालाबों का खत्म होना भविष्य पर प्रश्नचिन्ह है। देश के विभिन्न हिस्सों में तालाब पर कार्य हो रहे हैं, राजस्थान में वृहद स्तर पर कार्य रहा है, जलपुरुष राजेंद्रसिंह जी देश के विभिन्न हिस्सों में जल, नदियों और तालाबों की जागरुकता को लेकर कार्य कर रहे हैं, अनेक संकठन हैं जो जल जागरुकता लाने में जुटे हैं लेकिन हकीकत यह है कि बदलाव तब आएगा जब आम व्यक्ति मरते तालाबों का दर्द महसूस करेगा, उठ खड़ा होगा और उनके कायाकल्प में जुट जाएगा। हम यह पूरा सिस्टम सुधार सकते हैं बस अपने अपने आसपास के तालाबों की जिम्मेदारी हम मोहल्ला या गांव समिति बनाकर उठा लें, उनकी सफाई करें, उन्हें खराब न हो दें, उसका जल दूषित न होने दें...। तालाबों को लेकर समझदारी बढ़ानी होगी वरना न जमीन के भीतर पानी होगा और न ही जमीन के तल पर...। बेपानी सभ्यता होते हम नहीं देखते हैं इसलिए आगे आईये और कार्य में जुट जाईये...।
संदीप कुमार शर्मा,
प्रधान संपादक, प्रकृति दर्शन
फालो करने की जगह बताइए
ReplyDeleteसादर वंदे
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ReplyDeleteआभार संजय जी...मार्गदर्शन कीजिए...सेटिंग में यदि कोई दिक्कत है तो...प्लीज।
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